राजस्व विभाग में पटवारी के पद पर पदस्थ थे पति …मृत्यु को साल भर बीतते आये लेकिन आज तक न कोई क्लेम मिला,न पेंशन और न ही अनुकम्पा नियुक्ति…बच्चियों की फीस देने तक के लिए जूझ रही पीडित पत्नि

बड़ा सवाल…? क्या जनसुनवाई केवल कागजों में आवेदन लेने और “हो जाएगा” का आश्वासन देने का मंच बन गई है

जनमत भास्कर :- छिन्दवाड़ा कलेक्टर कार्यालय में हर मंगलवार को लगने वाली जनसुनवाई… जहाँ सरकार का दावा है कि आम आदमी की फरियाद तुरंत सुनी जाएगी। लेकिन इस दावे की हकीकत क्या है? आज एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जो शासन और प्रशासन दोनों को आइना दिखाती है।


तस्वीरों में दिख रहीं ये हैं वंदना राऊत… इनके पति विजय कुमार राऊत, राजस्व विभाग में पटवारी के पद पर पदस्थ थे। 12 नवंबर 2025 को उनका देहांत हो गया। एक सरकारी कर्मचारी, जिसने जिंदगी भर सरकार की सेवा की… आज उसकी विधवा एक साल से दर-दर भटक रही है।
एक साल… 365 दिन में एक विधवा को उसके पति की पेंशन तक नहीं मिली। बेटी की अनुकंपा नियुक्ति का आवेदन दबा पड़ा है। दो बेटियां हैं,उच्च शिक्षा ले रही हैं और मां उनकी फीस तक नहीं भर पा रही।
वंदना बताती हैं – कलेक्टर जनसुनवाई में 5 से 6 बार आ चुकीं,SDM कार्यालय के 5-6 चक्कर काट चुकीं,और तहसील के तो 10 से 20 चक्कर लगा चुकी हैं। हर जगह से सिर्फ एक ही जवाब मिलता है…”हो जाएगा,कर लेंगे, टाइम लगता है”


यही है जनसुनवाई की असलियत? क्या जनसुनवाई सिर्फ कागजों में आवेदन लेने और ‘हो जाएगा’ का आश्वासन देने का मंच बन गई है? एक साल तक एक पटवारी की विधवा को भटकना पड़े,तो आम गरीब आदमी का क्या होता होगा?


एक तरफ सरकार कहती है – हम कर्मचारी हितैषी हैं। दूसरी तरफ उन्ही के विभाग के कर्मचारी के मरने के बाद उसका परिवार न्याय के लिए 20 बार तहसील के चक्कर काट रहा है। यह संवेदनहीनता नहीं तो और क्या है?
इसीलिए यहां सवाल उठना लाज़मी है कि – जब कलेक्टर की जनसुनवाई में 6 बार आने के बाद भी एक विधवा को पेंशन नहीं मिलती,तो इस जनसुनवाई का औचित्य क्या है? क्या यह योजना भी सिर्फ पलीता लगाकर खानापूर्ति करने का जरिया बन गई है?