जनमत भास्कर,छिन्दवाड़ा:-मकर संक्रांति के पावन पर्व के साथ ही सूर्य के उत्तरायण होने और आयुर्वेद में वर्णित आदान काल की विधिवत शुरुआत हो गई है।आयुर्वेद विशेषज्ञों के अनुसार यह समय स्वास्थ्य के प्रति विशेष सावधानी बरतने का होता है,क्योंकि इस काल में सूर्य की किरणें अधिक तीव्र होकर मानव शरीर की ऊर्जा और बल पर प्रभाव डालती हैं।
आयुर्वेदाचार्यों ने बताया है कि मकर संक्रांति के बाद वातावरण में धीरे-धीरे रूक्षता और उष्णता बढ़ने लगती है। इसे आयुर्वेद में आदान काल कहा गया है,जिसमें सूर्य पृथ्वी और जीवों से जल,स्निग्धता और बल का शोषण करता है। इस कारण शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी आने की संभावना रहती है।
वात और पित्त दोष बढ़ने की आशंका
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार इस काल में विशेष रूप से वात एवं पित्त दोष असंतुलित हो सकते हैं,जिससे जोड़ों में दर्द,थकान,त्वचा की समस्याएं,पाचन विकार तथा चिड़चिड़ापन जैसी परेशानियां देखने को मिलती हैं।ऐसे में आयुर्वेदिक ऋतुचर्या का पालन अत्यंत आवश्यक हो जाता है।
ऋतुचर्या अपनाने की सलाह
आयुर्वेदाचार्यों ने आमजन से अपील की है कि मकर संक्रांति के बाद शिशिर ऋतु में तिल,गुड़,घी,दूध,गर्म एवं पौष्टिक भोजन का सेवन करें। नियमित तेल मालिश (अभ्यंग),हल्का व्यायाम, सूर्यस्नान और पर्याप्त नींद शरीर को स्वस्थ बनाए रखने में सहायक होते हैं।ठंडे,बासी और अधिक शुष्क भोजन से बचने तथा दिनचर्या में संयम रखने की सलाह भी दी गई है।
परंपराओं के पीछे छिपा है विज्ञान
विशेषज्ञों का कहना है कि मकर संक्रांति पर तिल-गुड़ खाने की परंपरा केवल धार्मिक नहीं,बल्कि आयुर्वेदिक दृष्टि से भी अत्यंत लाभकारी है।तिल शरीर को बल प्रदान करता है और वात दोष को शांत करता है, जबकि गुड़ ऊर्जा का अच्छा स्रोत है।
स्वस्थ जीवन का संदेश
मकर संक्रांति का पर्व हमें प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जीवन जीने की सीख देता है।आयुर्वेद के अनुसार ऋतु के अनुरूप आहार-विहार अपनाकर ही रोगों से बचाव संभव है।डॉ. प्रमिला यावतकर ने नागरिकों से अपील की है कि वे इस आदान काल में आयुर्वेदिक नियमों का पालन कर स्वस्थ और संतुलित जीवन की ओर कदम बढ़ाएं।




